Tuesday, December 11, 2012

Mere Baauji, Meri Maa!

तकलीफ दिलो की क्या समज पाना आसन है ,
उनका दर्द पढ़ पाना क्या आसन है ...
आखो में वो बेबसी जब देखती हु, 
दिल मेरा काप उठता है , 
इस खाली पण को भर पाना क्या आसन है ! 

ज़िन्दगी देने वाले , वो मेरे खुदा ,
मेरे बाउजी , मेरी माँ ! 
तुम्हे समज पाना क्या आसन है ! 

जो गम मैं तुम्हे देती हु , 
यकीं मानो! एहसास से परे है मेरे ..
लगता है मैं  खुदगर्ज़ हु, 
लगता है मैं  नाकामियाब हु, 
लगता है मैं  बेबस हु .. 
माँ तेरी ज्हुरिया देख मैं  घबराती हु, 
पा आपकी बढती  उम्र मुझे डराती है .. 
माँ तेरी मुश्कान मैं ला पाई, तो मैं खुश हु ,
पा  तेरे घुन्तो का दर्द कम कर पाई , तोह मैं  कामियाब हु! 

माना मैंने , मैं गुस्सा करती हु माँ! 
तुझे तकलीफ देते , मई भी खूब रोया करती हु माँ 
पा जो बोलोगे वो करुगी, एक बार पहेले की तरह मुस्कुरा दो ....
मुझे होसला देने वाले, मेरा हाथ पकडके चलने वाले मेरे पा ..
मुझे वैसे ही आपनी गौड़ में सोने दो ! 

मैं  क्या करू माँ, मुझे आज रोना आता है 
आप हो तोह सब चाहिए, वरना ...
सब फीका नजर आता है, 
मुझे और कुछ नहीं , बस तू चाहिए माँ! 
मेरे ऊपर तेरे आचल की छाया ,
पा के हाथो का  साथ चाहिए माँ ! 

माँ तेरे बिना मैं नहीं रह पाउगी 
पा कसम से , मैं युही रोते रोते मर जाऊगी !!! 



4 comments:

  1. bahut hi sunder abhivyakti hay is rachna me,jis me maa bhi hay aur ek aisa pariwar bhi jis ko us ghar ki beti bahut pyar karti hay.

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  2. Thank U lalit Sir, Aapne keh diya toh yakin ho gaya ki aacha likha hai :)

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