Thursday, December 13, 2012





ये मेरा मन आज  बैचैन क्यों है ...
सवालो का सह्लाब  सा आज क्यों है 
हर तरफ बस एक ख़ामोशी सी छाई है 
आज मेरे कानो में आवाजे आना बंद क्यों है !
मुझे लोग दिखाई देते है , हस्ते हुए , बोलते हुए, कुछ लोग है इनमे रोते हुए ... 
फिर भी , आज मेरे आस पास की दुनिया खामोश क्यों है !

मेरी कहानी के पन्ने सिमट न जाए ,लिखाई भी सेफद न हो जाए!

सिकुड़ति किताब के पन्ने पीले पीले न हो जाये !!

चाँद तारे से भरा आसमान आज खाली सा क्यों है, 

मुझे दिखाई दे रहा बस वो उडाता गुबार क्यों है, 
दूर जाता , नजरो से सब आज दूर जाता क्यों है! 

वो जो नाचा करते थे , गया करते थे, 

ज्हुम्के मेरे मन को महकाते थे , 
वो आज सब चुपसे क्यों है ! 

मेरे फूलो की बैल बढती नहीं, 

वो जो फूल खिला करते थे, वो आज हस्ते क्यों नहीं ! 
सब साथ होते भी आज ये अकेला पण क्यों है! 
ये मेरा मन आज बैचैन क्यों है!!  

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